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‘पेंशन भीख नहीं, हमारा संवैधानिक अधिकार’

(04:27:37 AM) 18, Jan, 2014, Saturday
पेंशन परिषद द्वारा वृध्दावस्था पेंशन पर राष्ट्रीय जन सुनवाई कार्यक्रम आयोजित
नई दिल्ली ! हम यहां पेंशन की भीख मांगने नहीं आए हैं। इस देश का संविधान हमें गरिमा और इजत के साथ जीने का अधिकार देता है। तब आप ही बताइए 500 रुपए महीना में कौन सा बुजुर्ग जी सकता है. हमारा अधिकार , हमें चाहिए, बात करके – लड़ कर या फिर जैसे भी मिले। ये बात जम्मू कश्मीर के कुपवाड़ा से आई 65 वर्षीय मेहरूनिशा ने आज राजधानी के कोंस्टीटयूशन क्लब में पेंशन परिषद द्वारा आयोजित वृध्दावस्था पेंशन पर राष्ट्रीय जन सुनवाई के दौरान कही।

मेहरूनिशा सहित 18 राज्यों के लगभग 500 बुजुर्ग लोग, सामाजिक कार्यकर्ता इस जनसुनवाई में उपस्थित थे। इस जन सुनवाई की जूरी में संयुक्त राष्ट्र की रेजिडेंट कोर्डिनेटर सुश्री लिसा ग्रेंड , राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण की सदस्य सचिव आशा मेनन , जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और जाने माने अर्थशास्त्री डॉ. प्रभात पटनायक , हेल्पेज इंडिया के श्री मेथ्यु चेरियन , डॉ. वंदना प्रसाद, वरिष्ठ पत्रकार गिरीश निकम, पूर्व सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्लाह और सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा राय आदि शामिल थे। इस जनसुनवाई के दौरान सामाजिक कार्यकर्ताओं ने एकस्वर में कहा की सरकार को समेकित राष्ट्रीय सामाजिक सहायता (पेंशन) पर बनी मिहिर शाह समिति के सुझावों को तत्काल लागू करना चाहिए। इस समिति के प्रमुख सुझावों में कहा गया था कि वित्त वर्ष 2013-14 में केंद्रीय सहायता बढ़ाई जाए और विधवा पेंशन स्कीम में आयु को 40 वर्ष से कम करके 18 वर्ष किया जाए। साथ ही ऐसी महिलाएं जिनके पति गुमशुदा हैं या गायब हो गए हैं , पर मरे नहीं हैं, उन्हें भी विधवाओं के बराबर ही पेंशन दी जाए। जनसुनवाई के लिए दिल्ली पहुंचे कार्यकर्ताओं के समूह को समबोधित करते हुए योजना आयोग के सदस्य डॉ. मिहिर शाह ने कहा कि हमारी टास्क फोर्स समिति ने बहुत मूलभूत और न्यूनतम सुझाव सरकार को सौंपे थे। अगर यही सुझाव लागू किए जाते तो सामाजिक सुरक्षा को बड़े स्तर पर सुनिश्चित किया जा सकता था। पेंशन परिषद की ओर से बोलते हुए सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा राय ने कहा की इस समिति के कुछ सुझावों पर वे सहमत नहीं है पर फिर भी सरकार अपनी ही बनाई समिति के सुझावों को नहीं मान रही, ये बड़ी आश्चर्यजनक बात है। उन्होंने कहा की वृध्दावस्था पेंशन के लिए प्रतिवर्ष महज 5000 करोड़ रुपए आवंटित कर केंद्र सरकार असंगठित क्षेत्र के कामगारों के लिए सार्वभौमिक पेंशन की मांग को पैसा ना होने के बहाना बनाकर टाल रही है. खतरनाक बात यह भी है की ग्रामीण विकास विभाग के बजट में 20 हजार करोड़ रुपए की कटौती की गई है। जाने माने अर्थशास्त्री और जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ने कहा की सरकार पूंजीपतियों को टैक्स में दी वाली छूट खत्म कर दे तो उस बचे पैसे पेंशन, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के मूलभूत अधिकार को सुनिश्चित किया जा सकता है। यह मुद्दा सरकार की उस नीति का है , जहाँ यह तय होना है की सरकार किसके साथ है, अमीर लोगों के या गरीब लोगों के, यदि सरकार को लगता है की गरीबों के लिए नीति बनाने से पूंजीपति अपनी पूंजी बाहर लगाने लगेंगे तो पूंजी को बाहर जाने से रोकने के कानूनी नियम बनाने चाहिए, नाकि गरीबों के अधिकार छीनने चाहिए। जूरी के समक्ष पानी बात रखते हुए ट्रांसजेंडर समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हुए नूरी ने कहा की हमारे समुदाय के लिए पेंशन की कोई व्यवस्था नहीं हैं. दिल्ली की पिछली सरकार ने इस समुदाय के लिए पेंशन की बात कही पर उसमें इतने नियम शर्तें रख दी कोई पूरी नहीं कर सकता।

नूरी ने मांग की ट्रांसजेंडर समुदाय के बुजुर्ग लोगों को भी अन्य बुजुर्गों की ही तरह माना जाय और बराबर पेंशन दी जाए। उन्होंने कहा की कम से कम 2 हजार रुपये पेंशन से कम में गुजारा करना नामुमकिन है।

उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले से आए अति पिछड़े सहरिया समुदाय की 61 वर्षीय छोटी देवी ने कहा की दलाल ने हमसे 500 रूपये लिए और कुछ कागज पर अंगूठा लगवाकर ले गया, पर 1 साल से यादा हो गया , आज तक पेंशन मिलना शुरू नहीं हुआ। प्रखंड कार्यालय पर गए तो बाबु ने कहा की अभी आपका नंबर नहीं आया है। जब पूछा की कितना वक्त लगेगा तो बोला की जब नाम आएगा तो बता देंगे।

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